अगर आप जमीन या कोई बड़ी संपत्ति बेचते हैं तो उस पर भारी भरकम टैक्स देना पड़ सकता है। लेकिन कई मामलों में कानून आपको टैक्स से राहत भी देता है। ऐसा ही एक दिलचस्प मामला महाराष्ट्र के पुणे से सामने आया है, जहां एक व्यक्ति ने ₹3.21 करोड़ में जमीन बेचने के बाद भी पूरा टैक्स बचा लिया। हालांकि शुरुआत में इनकम टैक्स विभाग ने उसकी राहत रोक दी थी, लेकिन आखिरकार अदालत के एक अहम फैसले ने पूरा मामला पलट दिया।
दरअसल, पुणे के बारामती के रहने वाले गुगाले का है। उन्होंने 18 मार्च 2014 को अपनी जमीन ₹3.21 करोड़ में बेची थी। बाद में उन्होंने 25 फरवरी 2015 को करीब ₹4 करोड़ का एक फ्लैट खरीद लिया और आयकर कानून की धारा 54F के तहत टैक्स छूट का दावा किया। लेकिन जब उनका इनकम टैक्स रिटर्न जांच के लिए गया, तो विभाग ने उनकी छूट को खारिज कर दिया। दरअसल, नियम के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति बिक्री से मिली रकम तुरंत नई संपत्ति में निवेश नहीं कर पाता, तो उसे बची हुई रकम कैपिटल गेन अकाउंट स्कीम (CGAS) में जमा करनी होती है। गुगाले ने इस खाते में ₹2.25 करोड़ ही जमा किए, जबकि बाकी ₹91.45 लाख जमा नहीं किए। इसी वजह से आयकर अधिकारी ने इस रकम को टैक्स योग्य मान लिया और उनकी आय बढ़ाकर करीब ₹1.08 करोड़ मान ली।
ITAT पुणे पहुंचा मामला
इस फैसले से परेशान होकर गुगाले ने इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) पुणे में अपील दायर की। इस मामले की सुनवाई 23 दिसंबर 2025 को हुई और 19 फरवरी 2026 को ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने जमीन बेचने से मिली पूरी रकम तय समय के अंदर नए घर में निवेश कर दी है, तो केवल तकनीकी गलती के आधार पर टैक्स छूट नहीं रोकी जा सकती।
हाईकोर्ट के पुराने फैसले का भी मिला सहारा
ITAT पुणे ने अपने फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के एक पुराने मामले (CIT बनाम रामचंद्र राव) का भी हवाला दिया। उस फैसले में भी कहा गया था कि अगर पूंजीगत लाभ को समय सीमा के भीतर नए घर में निवेश कर दिया जाए, तो CGAS में पैसा जमा न करने पर भी छूट मिल सकती है।
सेक्शन 54F क्या कहता है
आयकर कानून की धारा 54F के तहत अगर कोई व्यक्ति लंबी अवधि की संपत्ति बेचकर उससे मिली रकम नए घर में निवेश करता है, तो उसे कैपिटल गेन टैक्स से राहत मिल सकती है। हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें भी होती हैं, जैसे तय समय सीमा में नया घर खरीदना या बनवाना।
क्यों अहम है यह फैसला
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला कई टैक्सपेयर्स के लिए राहत भरा हो सकता है। इससे यह साफ हो गया है कि अगर असल में निवेश की शर्त पूरी हो जाती है, तो केवल प्रक्रिया से जुड़ी छोटी गलती के कारण टैक्स छूट नहीं छीनी जानी चाहिए।



































